सुमित के तड़के - SUMIT KE TADKE

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कविता : विश्वास

Posted On: 12 Jun, 2015 Others में

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आज सुबह-सवेरे अचानक
मिल गया विश्वास राह में
लगा पूछने क्यों हटा
विश्वास उसपर से
मैंने उससे कहा
इतना तोड़ा है
जग ने विश्वास
कि विश्वास पर से
विश्वास डोल गया है
वह बोला विश्वास पर
इस बार विश्वास
करके तो देखो
मैंने धीमे से कहा
चलो ठीक है
एक अवसर और सही।
लेखक : सुमित प्रताप सिंह
www.sumitpratapsingh.com



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2 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Bhola nath Pal के द्वारा
June 12, 2015

विश्वास जग पर नहीं स्वयं पर करना होता है तब विश्वास धोखा नहीं खाता

    SUMIT PRATAP SINGH के द्वारा
    June 19, 2015

    जी बिलकुल आभार…


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