सुमित के तड़के - SUMIT KE TADKE

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कविता: मज़दूर

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राम-राम साब मैं मज़दूर हूँ

मज़दूर यानि कि मजे से दूर

मेरी एक दूसरी भी है परिभाषा

मज़दूर होता है वो

जिसकी बाकी न बचती कोई अभिलाषा

जीवन उसका होता

केवल हताशा भरी निराशा

अपनी साथी है मेहनत

और जेवर है पसीना

हाड़-तोड़ मेहनत के बल ही

पड़ता है हमें जीना

फिर भी देखिए

हम रहते अनाड़ी के अनाड़ी

ठेकेदार ताल ठोंककर

छीन लेता है अक्सर दिहाड़ी

आधा पेट खाना और बाकी आधा

भरती है ई ससुरी बीड़ी

इन हालातों को ही सहते – सहते

बीत गई जाने कितनी पीढ़ी

अब आप पूछेंगे कि

कैसी है अपनी जोरू

अजी वो बेचारी कोल्हू के

बैल की तरह

दिन-रात पिरती रहती है

कभी अपने घर में

तो कभी सेठ जी के घर में

आपको मेरा वचन खल रहा है

पर सोचिए इस बहाने ही सही

मज़दूर का वंश तो चल रहा है

वरना इस अधभूखे शरीर में

भूख के शुक्राणुओं के सिवा

कुछ बचता भी है

अरे साब आपकी आँखें तो

आँसुओं से नम हो गईं

अजी हमारी आँसुओं की नदी तो

जाने कब की

इन आँखों में ही गुम हो गई

चलिए छोड़िये ये तो बताइये

कैसी लग रही है ये इमारत

इसे बनाने के लिए हमने की है

मेहनत से दिन-रात इबादत

जब ये सज-धजकर

पूरी तरह तैयार हो जायेगी

तब जाने इसको हमारी याद

आएगी या न आएगी

और हमें भी कहाँ होगी

फुरसत इसे याद करने की

क्योंकि हम तो लगे होंगे

किसी और इमारत को संवारने में

अपने खून-पसीने से सींचते हुए

उसे दुल्हन की तरह निखारने में

सुबह से शाम तक

थकान से होकर चूर

क्योंकि साब हम तो ठहरे मज़दूर

मजदूर यानि कि मजे से दूर।


रचनाकार: सुमित प्रताप सिंह


मज़दूर का चित्र गूगल बाबा से साभार



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4 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

yogi sarswat के द्वारा
May 3, 2013

अजी हमारी आँसुओं की नदी तो जाने कब की इन आँखों में ही गुम हो गई चलिए छोड़िये ये तो बताइये कैसी लग रही है ये इमारत इसे बनाने के लिए हमने की है मेहनत से दिन-रात इबादत जब ये सज-धजकर पूरी तरह तैयार हो जायेगी तब जाने इसको हमारी याद आएगी या न आएगी और हमें भी कहाँ होगी फुरसत इसे याद करने की क्योंकि हम तो लगे होंगे किसी और इमारत को संवारने में अपने खून-पसीने से सींचते हुए उसे दुल्हन की तरह निखारने में सुबह से शाम तक थकान से होकर चूर क्योंकि साब हम तो ठहरे मज़दूर बहुत सही और सटीक शब्द दिए हैं आपने अपने विषय को !

    सुमित प्रताप सिंह के द्वारा
    May 3, 2013

    शुक्रिया योगी जी…

jlsingh के द्वारा
May 1, 2013

मजदूर यानी मजे से दूर! बहुत ही अच्छी परिभाषा ! दूसरी जिसके पास न हो कोई आशा!!!!! आशा तो है सेठ जी के पास गिरवी आखिर करनी हो जो है वंश की बृद्धि!!!! एक एक शब्द चाबुक के सामान है अरे मजदूर भी कोई इंसान है! हर साल मजदूर दिवस मनाते हैं, इसी बहाने नेता अपनी नेता गिरी चमकाते हैं…… सुमित जी आपके सुमति में इसी प्रकार बृद्धि होती रहे हम सबको अच्छे से अछे रचना पढ़ने को मिले!

    SUMIT PRATAP SINGH के द्वारा
    May 2, 2013

    शुक्रिया सिंह साब. मैं निरंतर कुछ बेहतर लिखने का प्रयास करूंगा…


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