सुमित के तड़के - SUMIT KE TADKE

Delhi & Damini Anthem Writer's blog.

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मैं भी अन्ना हूँ

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कल(28.08.11) रात्रि सेवा के दौरान ही निश्चय किया कि मैं भी ड्यूटी समाप्त होने के उपरान्त रामलीला मैदान जाऊंगा और अन्ना जी को अनशन तोड़ते देखूँगा. अपने साथ चलने के लिए मैंने अन्ना भाई पद्म सिंह जी को आमंत्रित किया किन्तु अन्ना भाई अपनी तबियत तथा पद्म सिंह जी, जिन्होंने पिछले कई दिन रामलीला मैदान में अपनी उपस्थिति दर्ज करवाई, किसी कार्य में व्यस्त होने के कारण मेरे साथ चलने को तैयार न हो सके. मेट्रो से यात्रा करते हुए नई दिल्ली मेट्रो स्टेशन उतरा तो 10.20 बज चुके थे यानि कि मुझे अन्ना जी द्वारा अनशन तोड़ते देखने का सौभाग्य नहीं मिलने वाला था. खैर मैं देशभक्ति के नारे लगाती टोलियों के साथ मेट्रो स्टेशन से बाहर निकला. मेट्रो स्टेशन के बाहर मैं अन्ना हूँलिखी हुईं टोपियाँ मिल रहीं थी एक टोपी मैंने भी ले ली. मेरे साथ चल रहे एक बंधु ने मुझे सुझाव दिया कि अपने चेहरे पर तिरंगा बनवा लो तो मैंने कहा कि तिरंगा मेरे दिल में है सो मैं नहीं समझता कि मैं कोई दिखावा करूं. रामलीला मैदान के गेट पर पहुंचा वहां बहुत भीड़ थी आज मेरे जैसे बचे-खुचे मानव अपनी उपस्थिति वहां दर्ज करवाने आये हुए थे. मैदान में पहुंचा तो अन्ना जी का भाषण चल रहा था तथा वहां उपस्थित जनसमूह भारत माता की जय”, ”वन्दे मातरम्”, ”जय हिंद”, ”अन्ना हम तुम्हारे साथ हैंइत्यादि नारे लगा रहा था. कुछ समय बाद अन्ना जी ने  अपने साथिओं के साथ रामलीला मैदान से विदा ली. अब मैं भी उस पावन धरती को नमन कर वहां से चलने लगा. मैदान में सभी जश्न मनाने में मस्त थे. कोई देशभक्ति गीत गाकर थिरक रहे थे तो कोई भजन करने में व्यस्त थे. वहां से निकल कर मेट्रो स्टेशन आया तो पता चला कि बढ़ती भीड़ के कारण मेट्रो स्टेशन बंद कर दिया गया था. उस भीड़-भड़क्के को चीर कर मिन्टो रोड पर पहुँचा. वहां से बस में सवार हो घर की ओर चल पड़ा. बस में बैठे एक युवा लड़के ने मुझसे पूछा, ”अन्ना का क्या रहा?” मैंने प्रतिउत्तर में उससे पूछा कि क्या वह टी.वी. नहीं देखता. तो उसने उसके घर का केबल टी.वी. खराब है यह कहते हुए उसने अपना थूक भी मेरे चेहरे को भेंट कर दिया. मैंने उसे घूर के देखा तो वह झेंप गया और दूसरे ओर मुँह करके किसी से अपने मोबाइल से बतियाने लगा. उत्साह में आकर मैं दूसरे रूट वाली बस में बैठ गया था सो घर से एक किलोमीटर दूर उतर कर पैदल आना पड़ा. सिर पर मैं अन्ना हूँकी टोपी धारण किये जब मैं घर की ओर बढ़ रहा था तो ऐसा लग रहा था कि अन्ना मेरे भीतर ही उपस्थित हैं और मुझसे कह रहे हैं, ”बेटा सुमित प्रताप सिंह मैंने जो करना था कर दिया अब तुम युवाओं को इस देश को एक नई दिशा देनी है.”

www.sumitpratapsingh.com



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Santosh Kumar के द्वारा
August 29, 2011

सुमित जी ,.. आपके प्रेरणादायक जज्बे को सलाम http://santo1979.jagranjunction.com/


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